नगालैंड: एनएससीएन में टूट के डर ने मुइवा को समझौते के लिए किया मजबूर

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नीलू रंजन, नई दिल्ली। एनएससीएन (आइएम) अलग झंडे और संविधान की अपनी पुरानी मांग को छोड़कर भारत सरकार के साथ समझौते के लिए यूं ही तैयार नहीं हो गया है। सुरक्षा एजेंसियों की माने तो समझौता टूटने की स्थिति में एनएससीएन (आइएम) में टूट के कगार पर पहुंच गया था। यही नहीं, सात दशक की हिंसा से उब चुकी नगालैंड की आम जनता और खासकर युवा वर्ग इस बार शांति समझौते के पक्ष में खुलकर खड़ा था। दूसरी ओर सरकार के साथ बातचीत को बीच में छोड़कर हिंसा का रास्ता अपनाने वाले एनएससीएन (खापलांग) एसएस खापलांप की मौत के बाद दो भागों में बंट गया था और उससे अलग हुआ गुट बातचीत से शांतिपूर्वक समस्या का हल निकलाने के पक्ष में खड़ा हो गया था।

नगालैंड के राज्यपाल ने जारी किया बयान 

सात दशक पुरानी नागा समस्या के समाधान के लिए चल रही शांति वार्ता पर नजर रखने वाले केंद्र सरकार के उच्च पदस्थ सूत्रों की माने तो वे इस बार स्थायी समझौते को लेकर पूरी तरह आश्वस्त थे। यही कारण है कि 18 अक्टूबर में भारत सरकार की ओर से वार्ताकार और नगालैंड के राज्यपाल आरएन रवि ने बयान जारी कर एनएससीएन (आइएम) की अलग झंडे और संविधान की मांग को ठुकराते हुए उनके बिना समझौते पर आगे बढ़ने का ऐलान कर दिया था।

35 नेताओं ने बातचीत में भाग लिया

यही नहीं, इसके बाद बातचीत में एनएससीएन (आइएम) के लगभग 35 नेताओं ने बातचीत में भाग लिया। जाहिर है 84 साल के हो चुके एनएससीएन (आइएम) के महासचिव थुइंगालेन मुइवा के लिए कोई रास्ता नहीं बचा था। सबसे बड़ी बात यह है कि मुइवा पहले ही मणिपुर, असम और अरुणाचल प्रदेश के नागा बहुल इलाकों को जोड़कर ग्रेटर नागालैंड बनाने की मांग छोड़ चुके थे। जबकि खुद मुइवा मणिपुर के इलाके के रहने वाले हैं।

सेना ने खापलांग के ठिकानों को ध्‍वस्‍त किया 

एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि एनएससीएन (आइएम) में टूट के डर के साथ-साथ कई और कारक भी भारत के पक्ष में रहे। इनमें सबसे अहम है एनएससीएन (खापलांग) के प्रमुख एसएस खापलांग की जून 2017 में हुई मौत। 2001 से शांति वार्ता में शामिल खापलांग ने 2015 में खुद को इससे अलग कर लिया था, जून 2015 में 18 सैनिकों की हत्या कर सनसनी फैला दी थी। इसके बाद भारतीय सेना ने म्यांमार के भीतर खापलांग के ठिकानों को नेस्तानाबूद कर दिया था।

खापलांग की मौत के बाद एनएससीएन (खापलांग) दो भागों में बंट गया और एक गुट भारत सरकार के साथ बातचीत में जुट गया। वहीं भारत की कूटनीतिक पहल के बाद म्यामार सेना ने इस साल जनवरी-फरवरी में अपने इलाके में चल रहे आतंकी शिविरों के खिलाफ जबरदस्त कार्रवाई की।

आरएन रवि ने सभी गुटों से संपर्क साधा 

डिप्टी एनएसए और मुख्य वार्ताकार आरएन रवि को नागालैंड का राज्यपाल बनाने का सरकार का फैसला भी मुफीद साबित हुआ। कोहिमा में रहते हुए आरएन रवि ने चर्च के संगठन के अधिकारियों के साथ-साथ व्यापारियों, छात्रों, युवाओं, महिलाओं, कर्मचारियों सभी तरह संगठनों से संपर्क साधा और उन्हें शांति वार्ता का हिस्सा बना दिया। यही कारण है कि अलग झंडे और संविधान की मांग छोड़ने के बाद भी सभी वर्गो और संगठनों में बातचीत पूरी होने का स्वागत किया।