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Mystery: भगवान शिव को समर्पित चमत्कारी मंदिर, जो खड़ा है 1000 वर्षों से बगैर नींव पर…

भारत के कोने-कोने में अनेकों रहस्यमयी ईमारतें हैं जो अपने रहस्य के कारण चर्चाओं और आकर्षण का केंद्र बनती हैं, केवल रहस्य ही नहीं बल्कि ऐतिहासिक महत्व भी पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है। राज-महाराजाओं और चोल शासकों से संबंधित ऐतिहासिक स्थल हमें इतिहास से अवगत कराती है, और एक सीख देती है। इसी तरह चोल शासकों से जुड़ा ऐसा ही एक ऐतिहासिक स्थल है जो भगवान शिव को समर्पित तंजावुर या तंजौर का बृहदीश्वर मंदिर, जिसे ‘बड़ा मंदिर’ भी कहते हैं। बता दें, भारत की मंदिर शिल्प का उत्कृष्ट उदाहरण है तंजावुर स्थित बृहदीश्वर मंदिर। इस भव्य मंदिर को सन 1987 में यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया।
राजाराज चोल प्रथम ने 1004 से 1009 ईस्वी सन् के दौरान इस मंदिर का निर्माण कराया था। चोल शासकों ने इस मंदिर को राजराजेश्वर नाम दिया था लेकिन तंजौर पर हमला करने वाले मराठा शासकों ने इस मंदिर का नाम बदलकर बृहदेश्वर कर दिया। आइए जानते हैं इस मंदिर से जुड़े कुछ रहस्य जिनके बारे में नहीं जानते होंगे आप-
विशालकाय नंदी- यहां एक अद्भुत और विशालकाय नंदी है। एक विशालकाय चबूतरे के ऊपर विराजमान नंदी की प्रतिमा अद्भुत है। नंदी मंडप की छत शुभ्र नीले और सुनहरे पीले रंग की है इस मंडप के सामने ही एक स्तंभ है जिस पर भगवान शिव और उनके वाहन को प्रणाम करते हुए राजा का चित्र बनाया गया है। यहां स्थित नंदी की प्रतिमा भारतवर्ष में एक ही पत्थर को तराशकर बनाई गई नंदी की दूसरी सर्वाधिक विशाल प्रतिमा है। यह 12 फुट लंबी, 12 फुट ऊंची और 19 फुट चौड़ी है। 25 टन वजन की यह मूर्ति 16वीं सदी में विजयनगर शासनकाल में बनाई गई थी।
-विशालकाय शिखर-

बृहदीश्वर मंदिर के प्रवेश द्वार पर ही दो गोपुरम बनवाए गए हैं। इन दोनों गोपुरमों से गुजरते ही, आपको सामने ही, मंदिर का दृश्य अवरुद्ध करता हुआ एक विशाल नंदी दिखेगा। मंदिर के इस भाग को नंदी मंडप कहा जाता है। नंदी की यह विशाल मूर्ति देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे इसे मंदिर को बुरी नजर से बचाने का काम सौंपा गया हो। नंदी मंडप पार करते ही मंदिर की सबसे भव्य संरचना अथवा, मंदिर का शिखर आपका ध्यान अपनी ओर खींचता है। मंदिर की शिखर के शीर्ष पर एक ही पत्थर से बनाया हुआ विशाल वृत्ताकार कलश स्थापित किया गया है। इसे देखकर मन में यह शंका उत्पन्न होती है कि, शिखर का संतुलन बनाए रखने के लिए कहीं पूरा मंदिर ही डगमगा ना जाए। इस मंदिर के गुंबद को 80 टन के एक पत्थर से बनाया गया है, और उसके ऊपर एक स्वर्ण कलश रखा हुआ है।
-दुनिया का सबसे ऊंचा मंदिर-

13 मंजिला इस मंदिर को तंजौर के किसी भी कोने से देखा जा सकता है। मंदिर की ऊंचाई 216 फुट (66 मीटर) है और संभवत: यह विश्व का सबसे ऊंचा मंदिर है। लगभग 240.90 मीटर लम्‍बा और 122 मीटर चौड़ा है। यह एक के ऊपर एक लगे हुए 14 आयतों द्वारा बनाई गई है, जिन्हें बीच से खोखला रखा गया है। 14वें आयतों के ऊपर एक बड़ा और लगभग 88 टन भारी गुम्बद रखा गया है जो कि इस पूरी आकृति को बंधन शक्ति प्रदान करता है। इस गुम्बद के ऊपर एक 12 फीट का कुम्बम रखा गया है। चेन्नई से 310 कि.मी. दूर स्थित है तंजावुर का यह मंदिर कावेरी नदी के तट पर 1000 सालों से अविचल और शान से खड़ा हुआ है।
विशालकाय शिवलिंग- इस मंदिर में प्रवेश करते ही एक 13 फीट ऊंचे शिवलिंग के दर्शन होते है। शिवलिंग के साथ एक विशाल पंच मुखी सर्प विराजमान है जो फनों से शिवलिंग को छाया प्रदान कर रहा है। इसके दोनों तरफ दो मोटी दीवारें हैं, जिनमें लगभग 6 फीट की दूरी है। बाहरी दीवार पर एक बड़ी आकृति बनी हुई है, जिसे ‘विमान’ कहा जाता है। मुख्य विमान को दक्षिण मेरु कहा जाता है।
-बगैर नींव का मंदिर-

आश्चर्य की बात यह है कि यह विशालकाय मंदिर बगैर नींव के खड़ा है। बगैर नींव के इस तरह का निर्माण संभव कैसे है? तो इसका जवाब है कन्याकुमारी में स्थित 133 फीट लंबी तिरुवल्लुवर की मूर्ति, जिसे इसी तरह की वास्तुशिल्प तकनीक के प्रयोग से बनाया गया है। यह मूर्ति 2004 में आए सुनामी में भी खड़ी रही। भारत को मंदिरों और तीर्थस्थानों का देश कहा जाता है, लेकिन तंजावुर का यह मंदिर हमारी कल्पना से परे है। कहते हैं बिना नींव का यह मंदिर भगवान शिव की कृपा के कारण ही अपनी जगह पर अडिग खड़ा है।
उत्कृष्ठ शिलालेख- इस मंदिर के शिलालेखों को देखना भी अद्भुत है। शिललेखों में अंकित संस्कृत व तमिल लेख सुलेखों का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इस मंदिर के चारों ओर सुंदर अक्षरों में नक्‍काशी द्वारा लिखे गए शिलालेखों की एक लंबी श्रृंखला देखी जा सकती है। इनमें से प्रत्येक गहने का विस्तार से उल्लेख किया गया है। इन शिलालेखों में कुल तेईस विभिन्न प्रकार के मोती, हीरे और माणिक की ग्यारह किस्में बताई गई हैं।

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