DNA ANALYSIS: Spending time with a cow increases confidence |DNA ANALYSIS:गौमाता का ‘जगत माता’ वाला अवतार, दुनिया से दूर कर रही तनाव-उदासी

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नई दिल्ली: संतुलित भोजन के जरिए आप अपने शरीर को तो स्वस्थ बना सकते हैं. मन को स्वस्थ रखने के लिए अब आपको मनोवैज्ञानिक के पास नहीं बल्कि गाय के पास जाना होगा. आपको अपने घर के आसपास की किसी गौशाला, या Farm पर जाकर गाय को गले लगाना है. ऐसा करके आप अपने मन से उदासी या Depression को दूर कर सकते हैं.

विदेशों में लोकप्रिय हो रहा है ट्रेंड
विदेशों में ये Trend बहुत लोकप्रिय हो रहा है. वहां इसे Cow Cuddling के नाम से जाना जाता है. अमेरिका में कई Dairy Farms लोगों को Cow Cuddling की सेवाएं दे रहे हैं. गाय को गले से लगाने की सुविधा देने वाले Farm मालिकों के मुताबिक गाय का Heart Rate इंसानों के मुकाबले थोड़ा कम होता है और शरीर का तापमान थोड़ा ज्यादा. ऐसे में जब कोई इंसान गाय को गले लगाता है तो ये दोनों ही स्थितियां उसके दिमाग को Relax कर देती हैं .

गाय के साथ समय बिताने से बढ़ता है आत्मविश्वास
Meditation यानी ध्यान के दौरान भी दिल की धड़कन धीमी हो जाती है. ऐसा ही गाय को प्यार से छूने, या उसके साथ खेलने के दौरान भी होता है. मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक गाय के साथ समय बिताने से आत्मविश्वास बढ़ता है और मन में छिपे हुए डर भी दूर हो जाते हैं. अमेरिका में लोग 90 मिनट की इस Therapy के लिए करीब 22 हजार रुपये तक चुका रहे हैं. यूरोप और अमेरिका में ये Therapy निराशा और Anxiety के शिकार लोगों की मदद कर रही है.

Cow-Munication को पश्चिमी देशों में मिल रहा है बढ़ावा
Switzerland और Netherlands में 3 घंटे तक Cow Cuddling के लिए लोग लगभग 4 हजार रुपए चुकाते हैं.  वहां इस प्रक्रिया को एक खास नाम भी दिया गया है जिसे Cow-Munication कहा जाता है…यानी गाय के साथ बातचीत.

गाय का ममतामयी रूप लोगों के दिमाग को कर रहा है शांत
हमारे देश में जब हम किसी भोले-भाले व्यक्ति की तारीफ करते हैं तो अक्सर कहते हैं कि ये तो गाय की तरह सीधा है. गाय का यही सीधा और शांत स्वभाव अब दुनिया भर के लोगों को भा रहा है. भारत दुनिया का अकेला ऐसा देश है, जहां गाय को मां का दर्जा दिया गया है, लेकिन अब ये गायें दुनिया भर के लोगों को मां की तरह प्यार दे रही हैं और उनके दिमाग को शांत बना रही हैं. गाय अब सिर्फ भारत की नहीं बल्कि जगत माता बनने की राह पर है.

गाय का स्नेह आपको निराशा और तनाव से उबार सकता है
सीधी सादी, भोली भाली गाय आपकी जिंदगी में खुशियां बिखेर सकती है. गाय का दूध ही नहीं बल्कि उसका  स्पर्श भी आपके दुखी मन में आशा की किरण जगा सकता है. गाय को गले लगाना, उसकी पीठ थपथपाना और उसके साथ खेलना और उसे प्यार से सहलाना. उदासी से भरे आपके मन के लिए मरहम का काम कर सकता है.

अमेरिका-यूरोप में फल फूल रहा है Cow Cuddling का धंधा
यूरोप और अमेरिका में Cow Cuddling का इस्तेमाल एक मनोवैज्ञानिक इलाज पद्धति के तौर पर किया जा रहा है. Cow Cuddling की सुविधा देने वाले विशेषज्ञ मानते हैं कि गाय का भोलापन और शांत बर्ताव उन लोगों को फायदा पहुंचाता है, जो मानसिक परेशानी के दौर से गुजर रहे हैं. बड़ों के साथ साथ बच्चों को भी गाय का ये साथ खूब लुभाता है. तनाव और उत्तेजना से भरी जिंदगी में ये गायें बड़ी ख़ामोशी के साथ इंसानों की मदद कर रही हैं. भारत में गायों को प्यार किया जाता है. लेकिन विदेशों में इस जानवर की यही मासूमियत कारोबार की शक्ल ले रही है. 

जर्मनी की फ्रेडरिका एरिना ने गायों को जीवन समर्पित किया
भारत के राष्ट्रपति ने वर्ष 2019 में मूल रूप से जर्मनी की निवासी Friederike एरिना को पद्मश्री से सम्मानित किया था. एरिना पिछले 40 वर्षों से वृंदावन में रह रही हैं और लंबे समय से एक गौशाला के जरिए 1800 गायों की सेवा कर रही हैं. यहां के लोग इन्हें सुदेवी माता के नाम से बुलाते हैं. एरिना इस बात की जीती-जागती मिसाल हैं कि गाय को भारत की संस्कृति से अलग नहीं किया जा सकता.

कामधेनु है गौमाता
भारत में गाय को मां का दर्जा दिया गया है. गाय सिर्फ शरीर को स्वस्थ बनाने वाला दूध ही नहीं देती बल्कि गाय को कामधेनू माना जाता है. गाय के दूध से बनने वाले उत्पादों के अलावा गाय का गोबर और गौमूत्र भी बड़े काम के हैं. गाय सिर्फ नेमतों का खजाना नहीं है बल्कि आपके मन और मस्तिष्क की समस्याओं के इलाज की संजीवनी भी गाय के पास है.

लोगों को Cow-Nomics पढ़ने की जरूरत
गाय को प्रेम करके खुद को स्वस्थ बनाने का जिक्र भारतीय चिकित्सा पद्धति में आता है . लेकिन ये प्रक्रिया विदेशों में जाकर तो Cow Cuddling बन जाती है. जबकि हमारे देश में कोई इसे महत्व नहीं देता. इसिलए गाय के महत्व को समझने के लिए हमें उसके आर्थिक पक्ष को भी समझना होगा. आप इसे Cow-Nomics यानी गाय का अर्थशास्त्र भी कह सकते हैं.

भारत में कृषि योग्य  पशुओं की संख्या 51 करोड़
वर्ष 2012 में किए गए Live Stock Census के मुताबिक भारत में कृषि के लिए इस्तेमाल होने वाले जानवरों की संख्या 51 करोड़ है. इनमें से 11 करोड़ गाय हैं. भारत दूध का उत्पादन करने वाला सबसे बडा देश है. एक अनुमान के मुताबिक भारत में दूध का उद्योग 6 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा का है. इसीलिए आर्थिक नज़रिए से गाय को सबसे फायदेमंद पशुओं में एक माना गया है. गाय का दूध ही नहीं बल्कि उसका गोबर और गौमूत्र भी आर्थिक तरक्की के दरवाजे खोल सकता है.

गायों से हर साल 10 करोड़ टन गोबर मिलता है
 गायों से हर वर्ष 10 करोड़ टन गोबर हासिल होता है, जिसका इस्तेमाल ईंधन के तौर पर किया जाता है. इसकी कीमत 5 हज़ार करोड़ रुपये आंकी गई है. ईंधन के तौर पर गोबर का इस्तेमाल करने से हर वर्ष 5 करोड़ टन लकड़ी की भी बचत होती है. रासायनिक खाद के मुकाबले गोबर से बनी प्राकृतिक खाद खेतों के लिए बेहतर है. इससे फसल भी अच्छी होती है.

गाय के समाजशास्त्र को समझिए 
ऋगवेद में गाय को देवी का संज्ञा दी गई है. वैदिक शास्त्रों में किसी भी जानवर के मुकाबले गाय का जिक्र सबसे ज्यादा बार आता है. गाय से प्राप्त होने वाले दूध, घी, दही, गौमूत्र और गोबर को आयुर्वेद में पंच-गव्य कहा जाता है. जिनका इस्तेमाल पूजा-पाठ में होता है. वैज्ञानिक रिसर्च में भी ये साबित हुआ है कि गाय के दूध का सेवन करके कई रोगों का इलाज किया जा सकता है.

गाय का दूथ प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है
गाय के दूध में Protein, Carbohydrates, Minerals और Vitamin D होता है. ये रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है और लोगों को मानसिक तौर पर मजबूत करता है. कुल मिलाकर गाय पर भले ही देश में राजनीति होती है. लेकिन गाय का दूध, गोबर और गौमूत्र समाज के काम आता है. गाय आर्थिक और सामाजिक तौर पर देश के लिए कामधेनु जैसी है.

हमें गायों का भक्षक नहीं, उनका दोस्त बनना चाहिए
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि हमें गायों को मारना नहीं चाहिए, बल्कि उनका रक्षक और दोस्त बनना चाहिए. गांधी जी ये भी मानते थे कि गौरक्षा हिंदू धर्म की तरफ से विश्व को दिया गया सबसे बड़ा तोहफा है. बाल गंगाधर तिलक ने तो यहां तक कह दिया था कि ज़रूरत पड़े तो उन्हें मार दिया जाए, लेकिन गाय को छोड़ दिया जाए.

पश्चिम ने छीन लिया भारत का हल्दी वाला दूध
सिर्फ गाय को प्यार करना ही विदेश में जाकर Cow Cuddling नहीं बना बल्कि भारत का योग पश्चिम में जाकर योगा और हल्दी वाला दूध Turmeric Latte बन गया. हमने अपनी ही परंपराओं और संस्कृति को पिछड़ेपन की निशानी मान लिया जबकि यही चीजें विदेशों में जाकर सुपर हिट हो गई.

विदेश में जाकर भारत का योग बन गया YOGA
प्राचीन काल से भारत में योग, जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. लेकिन भारतीयों ने इसे तब अपनाया जब इसका नाम YOGA हो गया. अमेरिका में प्राणायाम की ट्रेनिंग के लिए लोग 1 लाख 82 हज़ार रुपए चुकाते हैं और वहां पर योग का बाज़ार लगभग 1 लाख 15 हज़ार करोड़ रुपए का है.

अमेरिका और ब्रिटेन में लोकप्रिय Drink बना Turmeric Latte
इसी तरह से भारत का ‘हल्दी वाला दूध’… पश्चिमी देशों में पहुंचकर Turmeric Latte बन गया है. इटैलियन भाषा में Latte का मतलब होता है दूध और ये नाम भारत और पश्चिमी देशों के लोगों को फैशनेबल लगता है. लेकिन असली नाम यानी ‘हल्दी वाला दूध’ उन्हें पसंद नहीं आता है. लेकिन जैसे ही ये फैशनेबल होकर Turmeric latte में बदल जाता है तो लोग इसकी मुंह मांगी कीमत देते हैं. आजकल भारत समेत कई देशों में आपको Turmeric Latte आसानी से मिल जाएगा. ये अमेरिका और ब्रिटेन में एक लोकप्रिय Drink बन चुका है. वर्ष 2025 तक पूरी दुनिया में हल्दी का बाजार 14 हजार 500 करोड़ रुपये से ज्यादा होने की उम्मीद है.

नीम की दातुन विदेश में बन गई Chew Sticks
भारत के गांवों में Toothbrush के बदले नीम के दातुन का प्रयोग किया जाता है. वहां यह मुफ्त में मिलता है. लेकिन विदेशों में इसे Chew Sticks का नाम दिया गया है. वहां इसकी कीमत 200 रुपए तक होती है. आपने बुजुर्गों को चारपाई का इस्तेमाल करते देखा होगा. भारत में इसकी कीमत 500 रुपये के करीब होती है. लेकिन ऑस्ट्रेलिया में ऐसी चारपाई लगभग 50 हजार रुपये में मिलती है. वहां इसे Traditional Indian Daybed कहा जाता है.

विदेशी कंपनियों ने गोमूत्र के 7 पेटेंट हासिल किए
 हमारे देश में गौमूत्र को लेकर बहुत सारे लोगों के मन में गलत धारणाएं हैं. पेट संबंधी बीमारियों में आयुर्वेद.गौमूत्र के सेवन की सलाह देता है. कई गंभीर बीमारियों में भी ये फायदेमंद होता है. अब विदेशी कंपनियों ने गौमूत्र के 7 Patents हासिल कर लिए हैं. सिर्फ परंपराएं ही नहीं, पश्चिम में अब भारत की पूजा करने की पद्धति भी मशहूर हो गई है. हमारे देश में पत्थरों की पूजा की जाती है. अब अमेरिका में इसकी नकल की गई है. वहां पर इसे Gratitude 
Rock का नाम दिया गया है. वहां के लोग इस पत्थर को प्रकृति से जुड़ने का एक माध्यम मानते हैं.

दूसरे अपना रहे और हम खो रहे हैं अपनी संस्कृति
कई पश्चिमी देश खुद को आधुनिक और हमें Third World Country मानते हैं. हालांकि भारत का प्राचीन ज्ञान भी बहुत तक हद विज्ञान पर आधारित है और समय समय पर ये बात सही साबित भी होती रही है. यही वजह है कि अब पश्चिमी देश भी हमारी परंपराओं और प्राचीन ज्ञान को अपना रहे हैं. आप इसे भारत की Soft Power कह सकते हैं. लेकिन हम अपनी Soft Power को संभाल कर रखने में नाकाम साबित हुए हैं. 

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