dna analysis role of media in 70 years know who is real godi media | DNA ANALYSIS: आंदोलन की कमी दिखाना मीडिया की गलती है, जानिए क्या है गोदी मीडिया का सच?

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नई दिल्ली: हमारे देश में एक वर्ग ऐसा भी है जो देश के प्रधानमंत्री के भाषणों को और इसे दिखाने वाले मीडिया को गोदी मीडिया कहता है. लेकिन जब JNU में देश विरोधी नारे लगाने के आरोप में जेल जा चुका कन्हैया कुमार जेल से बाहर आता है, तो उसके भाषण का तमाम न्यूज़ चैनलों पर.सीधा प्रसारण किया जाता है  और तब ऐसा करने वाले मीडिया को कोई गोदी मीडिया नहीं कहा जाता. इसलिए आज अब हम आपका परिचय देश के असली गोदी मीडिया से कराएंगे.

उदहारण के लिए किसान आंदोलन में भी कुछ ऐसे तत्व मौजूद हैं जो Zee News को रिपोर्टिंग करने से रोक रहे हैं, और Zee News का विरोध कर रहे हैं और हमें गोदी मीडिया कहकर बुला रहे हैं, जबकि सच्चाई ये है कि हमारे देश में जो ओरिजनल गोदी मीडिया है वो 70 वर्षों से सक्रिय है और आज भी अपने आकाओं की गोदी में बैठकर देश को बदलने से रोक रहा है.

इसी महीने की 1 और 4 तारीख़ को जब हमारे रिपोर्टर्स ने किसान आंदोलन में शामिल कुछ लोगों से ये पूछा कि आंदोलन में खालिस्तान के झंडे क्या कर रहे हैं तो अचानक भीड़ में शामिल कुछ लोगों ने हमारे रिपोर्टर्स के साथ बदसलूकी और धक्का-मुक्की शुरू कर दी.

आंदोलन का दुरुपयोग
ये हाल तब है जब हमने किसानों के विरोध में कभी कुछ नहीं कहा. हमने सिर्फ़ खालिस्तानियों की बात की जो ब्रिटेन, अमेरिका और Canada जैसे देशों में बैठकर पाकिस्तान के बहकावे में आकर इस आंदोलन का दुरुपयोग कर रहे हैं. देश का किसान हमसे नाराज़ नहीं है क्योंकि, किसानों के हित में जो काम Zee News ने किया, जितनी ख़बरें हमने दिखाई, उतनी किसी ने नहीं दिखाई. लेकिन फिर भी किसान आंदोलन की कुछ जगहों पर हमारे साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है और इन Clips को सोशल मीडिया पर वायरल करते हुए हमें गोदी मीडिया कहा जा रहा है.

हमारे देश में मीडिया का जो वर्ग देश के पक्ष में ख़बर दिखाता है, राष्ट्रहित को सबसे पहले रखता है उसे हमारे देश का एक वर्ग गोदी मीडिया कहकर बुलाने लगता है. इस शब्द के सहारे सबसे ज्यादा विरोध Zee News का होता है, हम जैसे ही टुकड़े टुकड़े गैंग, शाहीन बाग गैंग, अफज़ल प्रेमी गैंग, Award वापसी गैंग या खालिस्तान का सच देश को दिखाते हैं. वैसे ही हमें ये लोग गोदी मीडिया कहने लगते हैं. हमारा विरोध करने लगते हैं.

इसी साल 27 जनवरी को जब मैं (ज़ी न्यूज़ के एडिटर-इन-चीफ सुधीर चौधरी) खुद शाहीन बाग गया था, तो मुझे भी वहां धरना स्थल पर जाने से रोक दिया गया था. हमें रोकने के लिए मानव श्रृंखला बना दी गई थी. संविधान के पोस्टर्स हाथ में लेकर हमें हमारे ही देश के एक इलाके में घुसने से रोक दिया गया था.

इसी तरह जब पिछले वर्ष 18 नवंबर को हमारी रिपोर्टर रूफी ज़ैदी ने JNU में नए नागरिकता कानून के विरोध के दौरान लोगों से सवाल पूछने की कोशिश की, तो उनके साथ भी बदलसलूकी की गई और उन्हें भी वहां से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया गया.

पिछले वर्ष 15 दिसंबर को हमारे रिपोर्टर रवि त्रिपाठी दिल्ली के ITO पर CAA का विरोध करने वाले प्रदर्शनकारियों से बात कर रहे थे.  तब 4-5 लोगों ने मिलकर हमारे कैमरामैन से कैमरा छीनने की कोशिश की और धक्का देकर उन्हें जमीन पर गिरा दिया.

इससे पहले 15 नवंबर 2019 को JNU में, वहां के छात्रों ने हमारी दो महिला रिपोर्टरों को कवरेज करने से रोका. तब JNU में नए नागरिकता कानून का विरोध किया गया था. उस समय हमारी टीम विरोध करने वाले उन छात्रों से भी बात करना चाहती थी. लेकिन उन छात्रों ने हमारे सवालों का जवाब देने के बदले, हमारी Reporters को लगातार परेशान किया और नारेबाज़ी की.

…तो उन्हें गोदी मीडिया कहा जाने लगा
हाल के दिनों में जितने भी विरोध प्रदर्शन हुए उनमें अगर मीडिया ने प्रदर्शनकारियों के मन की बात नहीं कही, तो उन्हें गोदी मीडिया कहा जाने लगा. आपको याद होगा कि 2016 में जब कन्हैया कुमार जेल से बाहर आए, तो उन्होंने एक भाषण दिया. इस भाषण को देश के सभी न्यूज़ चैनलों ने दिखाया. लेकिन हमने ये भाषण नहीं दिखाया और जब हम ऐसा करते हैं, तो हम गोदी मीडिया बन जाते हैं. हमारी पत्रकारिता पर सवाल उठाए जाने लगते हैं.

लोकतंत्र में किसी एक पक्ष की नहीं, बल्कि सबके मन की बात सुनी जाती है. लेकिन इन लोगों को ये बर्दाश्त नहीं होता और ये लोग असहनशील हो जाते हैं.

ये लोग विरोध में टायर जलाते हैं, बसों में आग लगाते हैं, सड़कों को ब्लॉक कर देते है, भारत को बंद कर देते हैं और कई बार हिंसा भी करते हैं . ज़ाहिर सी बात है, ये लोग ऐसी हरकतें मीडिया के कैमरे को देखकर करते हैं, सोचिए अगर वहां मीडिया के कैमरे ना हों तो क्या ये लोग तब भी इस तरह से विरोध करेंगे. ये लोग चाहते हैं कि हम इन तस्वीरों का वही पहलू दिखाएं जो इन्हें सूट करता है. हम भारत बंद के दौरान दुकानों पर लगे ताले की तस्वीरें तो दिखाएं लेकिन ये ना दिखाएं कि इसके लिए दुकानदारों के साथ जबरदस्ती की गई, हम टायर जलाए जाने की तस्वीरें तो दिखाएं, लेकिन ये ना दिखाएं कि इस हुड़दंग की वजह से लोग घरों से बाहर निकलने से डर रहे हैं.

हम इनकी फरमाइश पर पत्रकारिता करें?
ये लोग चाहते हैं कि हम ये कहें कि नागरिकता कानून देश के लिए अच्छा नहीं है, लेकिन हम ये ना दिखाएं कि ये लोग इस विरोध की आड़ में देश विरोधी ताकतों को मंच दे रहे हैं. यानी हम इनकी फरमाइश पर पत्रकारिता करें और सच दिखाने वाली मिनटों और घंटों लंबी तस्वीरों को Tik Tok के 15-15 सेकेंड के Videos में बदल दें और इन्हें इनके एजेंडे के प्रचार का अवसर उपलब्ध  कराएं. जब हम ऐसा नहीं करते तो ये हमारा विरोध करते हैं, हमारे साथ धक्का-मुक्की और बदसलूकी करते हैं और हमारी पत्रकारिता पर सवाल उठाते हैं और हमें गोदी मीडिया कहने लगते हैं.

लेकिन असली गोदी मीडिया वो है जिसने सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान देश का साथ नहीं दिया, बालाकोट एयर स्ट्राइक के दौरान देश का साथ नहीं दिया, गोदी मीडिया वो है जिसने 2014 और 2019 के आम चुनाव के नतीजों का सम्मान नहीं किया, गोदी मीडिया वो है जो रफाल लड़ाकू विमानों की डील का विरोध करता है, गोदी मीडिया वो है जो पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे सुनकर भी चुप रहता है.

अगर कोई एक दो अखबार और न्यूज़ चैनल इनके तरीकों को सही बताने लगें और इनके विरोध प्रदर्शन को सही ठहराने लगें तो ये लोग खुश हो जाते हैं. यानी ये चाहते हैं कि मीडिया इनकी गोदी में बैठा रहे. ये लोग एकतरफा पत्रकारिता करने वालों को पद और पुरस्कारों से सम्मानित करने लगे और उन्हें क्रांतिकारी पत्रकार कहने लगते हैं और जो पत्रकार ऐसा नहीं करते उन्हें गोदी मीडिया कहा जाने लगता है. लेकिन सच हमेशा वही नहीं होता जो ये लोग मीडिया का इस्तेमाल करके देश को दिखाने की कोशिश करते हैं.

अब आप इसे एक उदाहरण से समझिए, 6 का अंक जब लिखा जाता है तो वो एक तरफ से 6 दिखाई देता है और दूसरी तरफ से 9 दिखाई देता है. हम 6 को 6 कहते हैं लेकिन ये चाहते हैं कि हम उसे 9 कहें और जब हम ऐसा नहीं करते तो सवालों का जवाब देने की बजाय नौ दो ग्यारह हो जाते हैं या फिर गैंग बनाकर हमारा विरोध करने लगते हैं. लेकिन ये लोग भूल जाते हैं कि आज भी देश में मीडिया का एक हिस्सा देश विरोधियों की धुन पर नहीं नाचता और इनकी धुन पर नाचने से मना करने वाले मीडिया को ही ये गोदी मीडिया कहकर बुलाते हैं.

कुल मिलाकर ये गैंग चाहता है कि. या तो हम सिर्फ इनकी सुनें या फिर पूरी तरह से चुप रहें. यानी सच को सच न कहा जाए और झूठ को झूठ न कहा जाए. सच और झूठ में बीच का कोई रास्ता नहीं होता. सच में शून्य दशमलव एक प्रतिशत की भी मिलावट होने पर वो सच नहीं रहता, जबकि झूठ में 99 प्रतिशत सच मिला देने पर भी वो झूठ ही रहता है.

पत्रकारिता का मतलब सच दिखाना
आज हमें एक Meme याद आ रहा है जो सोशल मीडिया पर अक्सर वायरल होता है, ये Meme किसी स्कूल जाने वाले बच्चे की कॉपी से लिया गया है. इसमें बच्चे को True Or False यानी सही या ग़लत के आधार पर सवालों के जवाब देने होते हैं. लेकिन जवाब में ये बच्चा True को इस अंदाज़ में लिखता है कि वो पढ़ने में True भी लगता है और False भी और False एजेंडा यानी दुष्प्रचार करने वाले चाहते हैं कि हम भी इसी बच्चे की तरह इनके False को True में बदल दें. लेकिन सत्य मानव जाति की केंद्रीय शक्ति है, सत्य के बगैर सारा संसार सिर्फ एक भ्रम जाल बनकर रह जाता है. सत्य की परिभाषा ये है कि कोई चीज़ जैसी है. उसे वैसा ही दिखाना सत्य है और पत्रकारिता का मतलब भी है सच दिखाना.

हिंदू संस्कृति में सत्य को मनुष्य का सबसे प्रमुख गुण माना गया है. सदियों पहले लिखे गए ऋगवेद में सत्य का जिक्र आता है. इसमें कहा गया है कि सत्य एक ही है. लेकिन ज्ञानी व्यक्ति उसे कई रूपों में देख सकता है.

भारत का आदर्श वाक्य भी सत्यमेव जयते है. भारत के राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ के नीचे भी यही आदर्श वाक्य लिखा है. ये पूरा श्लोक इस प्रकार है – सत्यमेव जयते नानृतम सत्येन. यानी सत्य की विजय होती है असत्य की नहीं. आपको जानकर हैरानी होगी कि यूरोप के देश Czech Republic का आदर्श वाक्य है “प्रावदा वीत्येज़ी” (Pravda vítezí,) इसका भी अर्थ है कि सत्य की विजय होती है.

यानी आदि काल से दुनिया ये मानती आई है कि सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं. फिर भी हमारे देश में कुछ लोग सत्य को पराजित करने की कोशिश करते हैं..जब वो इसमें असफल हो जाते हैं तो सच दिखाने वालों पर आरोप लगाने लगते हैं.

हिंदी के मशहूर लेखक और कवि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की एक प्रसिद्ध कविता है जिसका शीर्षक है-सत्य की जीत. इसकी कुछ पंक्तियां हैं-

झूठ का पक्ष गरजता सदा
लिये भौतिक बल का अभिमान।
सत्य का पक्ष मौन गम्भीर
लिये अंतर्बल का हिमवान॥

यानी झूठ बहुत ज़ोर से गरजता है, उसे खुद पर बहुत अभिमान होता है. लेकिन सत्य गंभीरता के साथ मौन बना रहता है क्योंकि उसके पास हिमालय जैसा अंतर्बल होता है.

लेकिन बहुत सारे लोग सत्य के इस बल को आज से नहीं, बल्कि वर्षों से कमज़ोर करने की कोशिश कर रहे हैं और इस सिलसिले ने देश की आजादी के बाद से ही बहुत रफ्तार पकड़ ली थी.

आज सच दिखाने वाले मीडिया को गोदी मीडिया कहा जाता है..लेकिन हकीकत ये है कि देश के ओरिजनल गोदी मीडिया का जन्म देश की आजादी के साथ ही हो गया था.

आजादी के बाद देश में पहली सरकार बनाने वाली कांग्रेस और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने सेक्लुयर दिखने के नाम पर उन नेताओं को भी अपने साथ ले लिया था जो आजादी से पहले पाकिस्तान के पक्षधर थे. इससे देश को बांटने वाले सेक्युलर हो गए और अखंड भारत का समर्थन करने वाले सांप्रयादिक कहलाए.

सच ये है कि मीडिया के इस हिस्से का पोषण उस समय की सरकारों की गोद में हुआ. पत्रकारों को उन देशों के दौरे पर भेजा जाने लगा जहां वामपंथी सरकारें थी और ये तथ्य है कि पूरी दुनिया में वापपंथी सरकारें अपने खिलाफ मीडिया में एक भी शब्द सुनना पसंद नहीं करतीं.

इसी दौरान मीडिया में एक और वर्ग का जन्म हुआ, ये वर्ग वामपंथी देशों के नहीं, बल्कि अमेरिका जैसे देशों के इशारों पर काम करता था और इसके लिए अमेरिका ने अपनी CIA जैसी खुफिया एंजेंसियों का भी खूब इस्तेमाल किया. अमेरिकी और वामपंथी दोनों ही विचारधाराएं भारत के सनातन दर्शन और विचारों से नफरत करती थी और हमारे देश का ओरिजल गोदी मीडिया इस नफरत को अखबारों के जरिए घर घर तक पहुंचाता था.

वापपंथी विचारधारा पत्रकारिता पर पूरी तरह हावी
वापपंथी विचारधारा पत्रकारिता पर पूरी तरह हावी थी और वो भी तब जब 1962 में चीन के साथ युद्ध के समय वामपंथी भारत का नहीं चीन का पक्ष ले रहे थे. जो चीन के वामपंथियों को अपना भाई समझते थे और भारत-चीन युद्ध में चीन का समर्थन कर रहे थे. जब 1962 का युद्ध हुआ था, तो भारत के वामपंथियों के एक वर्ग ने ये कहते हुए चीन का समर्थन किया था कि ये युद्ध नहीं, बल्कि एक समाजवादी देश और एक पूंजीवादी देश के बीच का संघर्ष है. ये तब हो रहा था, जब कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया यानी CPI भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी थी.

उस समय पूरा देश हमलावर चीन को खदेड़ने की बात कर रहा था लेकिन भारत के वामपंथी ये मानने को तैयार नहीं थे कि सीमा पर चीन ने हमला किया था, उनका मानना था कि उग्र रवैया भारत का था और हमलावर भारत है. जब पूरा देश अपनी सेना के जवानों के लिए खून दे रहा था, तो Communist Party of India इसका विरोध कर रही थी. सेना के जवानों को खून देने को CPI पार्टी विरोधी गतिविधि मानती थी.

यहां तक कि कई वामपंथी नेता चीन के समर्थन में रैलियां कर रहे थे. 1962 के युद्ध में Communist Party of India यानी CPI चीन का इस तरह से समर्थन कर रही थी कि तत्कालीन सरकार को इस पार्टी के नेताओं को जेल भेजना पड़ा था और इसी बीच CPI टूट गई और CPI M का गठन हुआ.

ये भारत के कम्युनिस्टों की चीन के कम्युनिस्टों के प्रति ऐसी वफादारी थी, जिसमें देश के साथ गद्दारी करने में भी हिचक नहीं हुई. हालांकि 1959 में भारत में Television आया और 1965 में दूरदर्शन के माध्यम से TV पर खबरें दिखाई जाने लगी जो सरकार का चैनल था. 1990 तक टीवी पर दिखाई जाने वाली खबरों पर सरकार का ही नियंत्रण था  और ज्यादातर अखबार स्वतंत्र होते हुए भी…कांग्रेस के पक्ष में खबरें छापते थे. यहां तक की इमरजेंसी के दौरान भी बड़ी संख्या में अखबारों के संपादकों ने इंदिरा गांधी के फैसले का समर्थन किया था.

तब अखबार सरकार की नीतियों पर सीधा प्रहार करते ही नहीं थे और जो अखबार करते थे. उन्हें वामपंथियों या अमेरिका की गोद में बैठा पत्रकार बता दिया जाता था.

लेकिन 1990 के दशक में देश में प्राइवेट न्यूज़ चैनलों की शुरुआत हुई, ज़ी न्यूज़ देश का पहला प्राइवेट न्यूज़ चैनल था और इसी के साथ मीडिया पर सरकार का नियंत्रण धीरे धीरे कम होने लगा. आज देश में 400 से भी ज्यादा न्यूज़ चैनल्स हैं. लेकिन इनमें से भी ज्यादातर मीडिया उद्योगपतियों की जेब में चला गया, जबकि भारत के कई अखबार तो पहले से ही व्यापारिक घरानों के नियंत्रण में थे.

लेकिन भारत का असली गोदी मीडिया कभी समाप्त नहीं हुआ आज राष्ट्रवाद की बात करने वाले न्यूज़ चैनलों की संख्या बढ़ी तो है. लेकिन इनमें वो चैनल भी बड़ी संख्या में है जो दादरी में अखलाक की हत्या का तो खुलकर विरोध करते हैं, इस पर कई हफ्तों तक Reporting करते हैं…लेकिन जब पालघर में साधुओं की हत्या होती है तो उस पर बात नहीं करते अभियान नहीं चलाते और Zee News जैसा कोई चैनल अगर सभी पक्ष दिखाने की कोशिश करता है तो उसकी पत्रकारिता पर सवाल उठाए जाने लगते हैं.

असली गोदी मीडिया कैसे आजादी के बाद से ही सक्रिय हो गया?
असली गोदी मीडिया कैसे आजादी के बाद से ही सक्रिय हो गया था उसका एक उदाहरण आज आपको देखना चाहिए. 27 सितंबर 1951 को संविधान निर्माता और देश के पहले कानून मंत्री डॉक्टर भीम राव अंबेडकर ने नेहरू की कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया था. लेकिन 10 अक्टूबर 1951 को उन्होंने अपना इस्तीफा संसद में पढ़ने का फैसला किया क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि जब उनके इस्तीफे की खबर अखबारों में छपे, तो उसके कारणों को अखबार अपने अपने ढंग से परिभाषित करें. उनका कहना था कि अगर कोई मंत्री बिना अपना वक्तव्य दिए, अपना पद छोड़ देता है तो उससे लोगों को लगता है कि जरूर मंत्री ने कुछ गलत किया होगा.

इस दौरान उन्होंने तत्कालीन मीडिया को लेकर जो कहा उस पर भी आपको गौर करना चाहिए. उनके भाषण की कॉपी इस समय मेरे हाथ में है.

आप गौर करेंगे तो आज भी ऐसा ही होता है, मीडिया जिनको पसंद करता है उनके हर सही गलत फैसले को सकारात्मक तरीके से दिखाता है और जिन्हें नापसंद करता है उनके बारे में नकारात्मक खबरें लिखी जाने लगती हैं.

लेकिन आजादी के बाद 70 वर्षों तक गोदी मीडिया के इस Eco System ने आखिर काम कैसे किया. इसे समझने के लिए आप एक डायग्राम देखिए. गोदी विचारधारा का Eco System चार खभों पर टिका है. पहला खभों है दरबारी इतिहासकारों का, जिन्होंने इतिहास को ऐसे पेश किया. ताकि ये देश कभी एक हो ही न पाए. दूसरा स्तंभ है, स्कूल और कॉलेजों में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों का. इनके जरिए भी देश की पीढ़ियों के मन में दरबारी राजनीति को पसंद आने वाले विचार अंकुरित किए गए.

दरबारी और डिजायनर पत्रकार
तीसरा स्तंभ दरबारी और डिजायनर पत्रकारों का है, जिन्होंने देश को खतरा पहुंचाने वाली विचाऱधारा के लिए अपनी पत्रकारिता को काम पर लगा रखा है और आखिर में आते हैं वो बुद्धिजीवी जो देश को बार बार ये कहकर डराते हैं कि देश का लोकतंत्र खतरे में है और लोगों की आजादी छीन ली जाएगी.

लेकिन जब देश की मीडिया के एक हिस्से ने इस Eco System को धक्के लगाने शुरू किए और इस Eco System को चोट पहुंचने लगी तो इन लोगों को परेशानी होने लगी और आज ये परेशानी और खीज Zee News के विरोध और बहिष्कार तक पहुंच गई है. इसलिए आप अगर इस Eco System को बनाने वालों और इसे तोड़ने की कोशिश करने वालों में अंतर करना सीख गए तो यकीन कीजिए आपको सच साफ साफ दिखाई देने लगेगा.



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