DNA ANALYSIS Radhanath Sikdar a mathematician who is known for calculating the height of Mount Everest | Mount Everest का नाम ‘माउंट सिकदर’ क्यों नहीं?

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नई दिल्ली: आज हम आपसे सामान्य ज्ञान का एक सवाल पूछना चाहते हैं. क्या आप जानते हैं कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट का नाम Mount Everest क्यों है?

इसका जो जवाब इतिहास किताबों में पढ़ाया जाता है. वो ये है कि वर्ष 1865 में रॉयल ज्योग्राफिकल सोसायटी (Royal Geographical Society) ने दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी का नाम Mount Everest रखा था. ये नामकरण सर जॉर्ज एवरेस्ट (Sir George Everest) के नाम पर हुआ था. जॉर्ज एवरेस्ट वर्ष 1830 से 1843 तक भारत में नक्शे और मानचित्र बनाने वाली सबसे संस्था सर्वे ऑफ ​इंडिया के प्रमुख थे और 1866 में 1 दिसंबर को उनका निधन हुआ था.

अब हम आपसे दूसरा सवाल पूछना चाहते हैं कि माउंट एवरेस्ट का नाम माउंट राधानाथ सिकदर क्यों नहीं है?

सच ये है कि पश्चिम बंगाल के एक गणितज्ञ राधानाथ सिकदर ने पहली बार माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई को रिकॉर्ड किया था. लेकिन ब्रिटिश साम्राज्य ने उनका नाम छिपा दिया और इस महान खोज का श्रेय Sir Andrew Scott Waugh को दे दिया.

Andrew Scott Waugh उस समय सर्वे ऑफ ​इंडिया के डायरेक्टर थे. इसलिए ये श्रेय राधानाथ सिकदर से छीनकर एंड्रयू को दे दिया गया, जबकि इसका असली हकदार एक भारतीय था.

– माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई का आधिकारिक आकलन पहली बार ब्रिटिश राज में सर्वे ऑफ ​इंडिया द्वारा किया गया था. इस एजेंसी की स्थापना भारत का आधिकारिक मानचित्र बनाने के लिए की गई थी.

– वर्ष 1830 में सर जॉर्ज एवरेस्ट, सर्वे ऑफ ​इंडिया के डायरेक्टर बने थे और वर्ष 1831 में उन्होंने पश्चिम बंगाल के एक गणितज्ञ राधानाथ सिकदर को सर्वे ऑफ ​इंडिया में Computer के पद पर नियुक्त किया था.

– उस समय Computer का अविष्कार नहीं हुआ था. सारी गणनाएं इंसान ही किया करते थे और ऐसे लोगों को सर्वे ऑफ ​इंडिया में Computer कहा जाता था क्योंकि, Computer का मूल काम गणना करना ही होता है.

– वर्ष 1830 के दशक में सर्वे ऑफ ​इंडिया की टीम हिमालय पर्वत श्रृंखला के करीब पहुंच गई थी. उस समय कंचन-जंगा पर्वत के शिखर को ही दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी माना जाता था.

– वर्ष 1852 में राधानाथ सिकदर ने ‘Peak 15’ नामक पर्वत शिखर को मापने का काम शुरू किया. उस समय माउंट एवरेस्ट को इसी नाम से जाना जाता था. तब विदेशियों को नेपाल की सीमा में दाखिल होने की इजाजत नहीं थी. एक विशेष उपकरण की मदद से राधानाथ सिकदर ने ‘Peak 15’ की ऊंचाई 8 हज़ार 839 मीटर रिकॉर्ड की थी.

– सर्वे ऑफ ​इंडिया के तत्कालीन डायरेक्टर Andrew Scott Waugh ने 4 वर्ष तक राधानाथ सिकदर के आकलन की जांच की. Andrew Scott, सर्वे ऑफ ​इंडिया के पूर्व डायरेक्टर सर जॉर्ज एवरेस्ट के साथ काम कर चुके थे और उन्हें अपना गुरू मानते थे. इसीलिए उन्होंने ‘Peak 15’ पर्वत शिखर का नाम माउंट एवरेस्ट रखने का प्रस्ताव ब्रिटेन की Royal Geographical Society को भेजा था.

– यानी राधानाथ सिकदर से माउंट एवरेस्ट की आधिकारिक ऊंचाई मापने का श्रेय छीन लिया गया और दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत शिखर का नामकरण एक अंग्रेज के नाम पर कर दिया गया.

ब्रिटिश सरकार ने इस जानकारी को छिपाने की पूरी कोशिश की थी. इसके बावजूद राधानाथ सिकदर की महान खोज को छिपाया नहीं जा सका.

– वर्ष 1966 में Indian Journal of History of Science में भी राधानाथ सिकदर की इस सफलता के बारे में जानकारी दी गई थी. ये एक साइंस जर्नल है और पहली बार वर्ष 1966 में इसका प्रकाशन हुआ था.

– इस जर्नल के मुताबिक राधानाथ सिकदर वर्ष 1849 में Survey of India के चीफ कम्प्यूटर बन चुके थे और इस काम में दूसरे लोगों की भी थोड़ी-बहुत भूमिका थी. लेकिन इसके केंद्र में राधानाथ सिकदर ही थे.

– हैरान करने वाली बात ये भी है कि नेपाल और तिब्बत की सीमा पर मौजूद माउंट एवरेस्ट का नाम तिब्बती भाषा में चोमो-लुंगमा है. नेपाल के लोग इसे सागर-माथा के नाम से जानते हैं. लेकिन पूरी दुनिया में ये माउंट एवरेस्ट  के नाम से प्रसिद्ध है. हालांकि जॉर्ज एवरेस्ट ने खुद कभी हकीकत में माउंट एवरेस्ट को देखा तक नहीं था.

– अब भी इस गलती को सुधारना मुमकिन है और Mount Everest का नाम बदलकर माउंट राधानाथ सिकदर किया जा सकता है.

दुनियाभर में पर्वत शिखरों का नाम रखने की कोई एजेंसी नहीं है. लेकिन अगर भारत सरकार चाहे तो नेपाल, चीन और UNESCO के साथ मिलकर माउंट एवरेस्ट का नाम बदलने की कोशिश कर सकती है. माउंट एवरेस्ट नेपाल और तिब्बत की सीमा पर स्थित है. इस समय तिब्बत पर चीन का कब्जा है और नाम बदलने के लिए इन देशों की सहमति जरूरी होगी. माउंट एवरेस्ट नेपाल के सागरमाथा नेशनल पार्क में मौजूद है और ये एक UNESCO World Heritage Site है. यानी माउंट एवरेस्ट का नाम बदलने के लिए UNESCO की सहमति भी जरूरी है. हालांकि ऐसा करने के लिए सबसे पहले भारत सरकार को कूटनीतिक शुरुआत करनी होगी और ये प्रयास भी अपने आप में माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई जितना ही मुश्किल है.

अब आपको Mount Everest के बारे में कुछ दिलचस्प बातें भी जान लेनी चाहिए

माउंट एवरेस्ट को वैसे तो दुनिया का सबसे ऊंचा पर्वत कहा जाता है. पर्वतों की ऊंचाई का आकलन समुद्र की सतह से उसकी ऊंचाई के आधार पर किया जाता है. लेकिन अगर किसी पर्वत के आधार से उसके शिखर तक की ऊंचाई मापी जाए तो Mount Everest सबसे ऊंचा पर्वत नहीं है. Base यानी आधार से चोटी तक की ऊंचाई के नजरिए से अमेरिका के हवाई का ‘माउना किया’ दुनिया का सबसे ऊंचा पर्वत है.  माउना किया की ऊंचाई 10 हज़ार 210 मीटर है.

– आपको जानकर हैरानी होगी कि हिमालय दुनिया की सबसे युवा पर्वत श्रृंखला है जिसकी ऊंचाई अब भी लगातार बढ़ रही है. वैज्ञानिकों के मुताबिक माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई हर साल 4 मिलीमीटर बढ़ जाती है. यानी 100 वर्षों में इसकी ऊंचाई 16 इंच तक बढ़ जाती है.

8 हजार मीटर की ऊंचाई पर Mount Everest का Death Zone शुरू होता है क्योंकि खराब मौसम और ऑक्सीजन की कमी की वजह से सबसे ज्यादा मौतें यहीं होती हैं.

– एवरेस्ट Everest की चढ़ाई करने वालों को “Two o’Clock Rule” का पालन करना होता है. यानी चढ़ाई करने वालों को दोपहर 2 बजे तक माउंट एवरेस्ट पर पहुंचना होता है क्योंकि इसके बाद मौसम बदलना शुरू हो जाता है.

– तकनीक के विकास की वजह से एवरेस्ट पर चढ़ाई के दौरान होने वाली मौतों में हर साल 2 प्रतिशत की कमी आ रही है.

– आधिकारिक तौर पर माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई से पहले 10 हफ्तों की कठिन ट्रेनिंग लेनी होती है. इसके बाद ही एवरेस्ट पर जाने की इजाजत मिलती है.

अगर माउंट एवरेस्ट का नाम भारत के गणितज्ञ राधानाथ सिकदर के नाम पर होता तो इससे भारत का नाम दुनियाभर में प्रसिद्ध होता. हालांकि इसके लिए कोशिशें पहले शुरू नहीं हुई थीं.

सिर्फ माउंट एवरेस्ट ही नहीं बल्कि हमारे देश के नाम के साथ भी ऐसा ही हुआ. भारत को इंडिया नाम भी विदेशियों ने ही दिया है. इतिहासकार मानते हैं कि सबसे पहले ग्रीस के लोगों ने भारत को इंडिका कह कर बुलाया और बाद में धीरे धीरे ये नाम इंडिया में बदल गया. आज भी भारत में एक वर्ग ऐसा है जो अपनी पहचान को भारत से नहीं, बल्कि इंडिया से जोड़कर देखता है और अंग्रेजों को अपना वैचारिक पूर्वज मानता है. ऐसे ही लोगों की वजह से इंडिया और भारत के बीच की खाई लगातार बड़ी हो रही है.

अब इस बात पर भी बहस चल रही है कि क्यों न भारत के लिए इंडिया शब्द का प्रयोग पूरी तरह बंद कर दिया जाए. भारत के संविधान में लिखा है – India, That is Bharat, shall be A union of states’. यानी विदेशियों का दिया हुआ नाम आखिरकार भारत के संविधान का भी हिस्सा बन गया.

इसके अलावा सिंधु नदी के नाम पर भारत का नाम हिंदुस्तान भी पड़ा । सिंधु का उच्चारण फारसी भाषा में हिंदू किया जाता है और कई लोग मानते हैं कि इसी वजह से भारत को हिंदुस्तान भी कहा जाता है ।

लेकिन भारतीय पुराणों और ग्रंथों में भी भारत को अलग अलग नाम दिए गए हैं. इनमें मेलुहा, भारत, भारत वर्ष. आर्यवर्त और जम्बूद्वीप जैसे नाम शामिल हैं.

सनातन संस्कृति में जब भी कोई पूजा पाठ या हवन होता है और इस दौरान जब संकल्प लिया जाता है तो आपके नाम और शहर के नाम के साथ जम्बूद्वीपे भरतखंडे भी कहा जाता है. ये इस बात का प्रमाण है कि भारत को किसी जमाने में जम्बूद्वीप के नाम से भी जाना जाता था.

यानी विदेश से आए लोगों ने धीरे धीरे भारत की पहचान मिटाने की कोशिश की और इसी कोशिश के तहत कभी मुंबई को बॉम्बे, कभी चेन्नई को मद्रास, कोलकाता को कलकत्ता और दिल्ली को डेल्ही कर दिया गया. और गुलाम मानसिकता के शिकार लोगों ने पहले इसे खुशी खुशी स्वीकार लिया और फिर वर्षों तक गुलामी की इस पहचान को ही अपनी असली पहचान मानकर चलते रहे और आज भी चल रहे हैं.

लेकिन याद रखिए जो देश अपनी जड़ों को भुला देता है. उस देश को दुनिया कभी सम्मान की दृष्टि से नहीं देख पाती.



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