DNA ANALYSIS 26 November Constitution Day Samvidhan Divas Indian constitution | क्या हमारा देश पूरी तरह से संविधान की भावना के अनुरूप चल रहा है?

नई दिल्ली: 26 नवंबर का दिन हमारे लिए बहुत गौरव का दिन है. 71 वर्ष पहले 26 नवंबर 1949 को भारत के लोगों ने ये तय किया था कि देश संविधान के हिसाब से चलेगा. किसी आसमानी, धार्मिक किताब या किसी व्यक्ति की इच्छा के अनुसार नहीं. पर क्या ये देश पूरी तरह से संविधान की भावना के अनुरूप चल रहा है? या फिर हम गलत रास्ते पर आ गए हैं? मैं ये सवाल क्यों कर रहा हूं, इसे समझाने के आज हम आपसे दो सवाल पूछना चाहते हैं. अगर किसी साधारण आदमी को भगवद्गीता दी जाए तो वो क्या करेगा? उसे देखेगा और अपने माथे पर लगा लेगा. फिर उसी आदमी को हम भारत का संविधान दें तो वो क्या करेगा, वो आश्चर्य से पूछेगा इसका क्या करूं ? मुझे ये क्यों दे रहे हैं?

दरअसल, हम एक राष्ट्र के रूप में अपने संविधान को शासन की गीता बनाने से चूक गए हैं. देश के सबसे कमजोर आदमी के जीवन में संविधान का असर पहुंचा नहीं पाए. हम अदालत में गीता की कसम लेकर सच बोलते हैं पर संविधान को लेकर वो भावना देश के नागरिकों में जन्म नहीं ले सकी. हम देश के नागरिकों को ये समझा नहीं पाए कि संविधान इस देश की सबसे पवित्र पुस्तक है.

आप लोगों में से शायद ही कोई ऐसा हो जिसे गीता का सार याद न हो, कि कर्म करो फल की इच्छा मत करो. पर हममें से शायद कुछ ही लोग ऐसे होंगे जिन्हें संविधान का सार याद हो कि स्वतंत्रता, समानता और न्याय ही हमारे शासन का आधार है.

ऐसा क्यों हुआ, इसे समझाने के लिए आपको वर्ष 1949 में संविधान की मूल प्रस्तावना में लिखे गए शब्द देखने चाहिए, हम भारत के लोग, भारत को संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए…

संविधान स्वीकार करने के 27 साल बाद यानी वर्ष 1976 में दो शब्द प्रस्तावना में जोड़े गए, हम भारत के लोग भारत को संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए…

समाजवादी और पंथनिरपेक्ष ये वो दो शब्द हैं जिन्हें वर्ष 1949 में जगह नहीं दी गई थी. ऐसा कहा जाता है कि समाजवादी शब्द को शामिल करके ततकालीन कांग्रेस सरकार खुद को गरीबों के साथ दिखाना चाहती थी और पंथनिरपेक्ष शब्द को संविधान में शामिल करके अल्पसंख्यकों को खुश करने की कोशिश की गई. लेकिन वर्ष 1975 में इमरजेंसी लागू करने के बाद जनसंख्या नियंत्रण की कोशिशों से अल्पसंख्यकों की भावनाएं आहत हुई थीं.

समाजवादी शब्द पर गांधीवादी राजी नहीं थे. उन्हें लगता था कि भारत कैसा होगा ये तय करना अभी सही नहीं होगा जबकि पंथनिरपेक्षता के लिए भीमराव अंबेडकर को लगता था कि इसकी जरूरत नहीं है क्योंकि, भारत स्वभाव से सबको साथ में लेकर चलने वाला देश है. डॉ. भीमराव अंबेडकर ने 17 दिसंबर 1946 को एक भाषण दिया था. इस भाषण को सुनने के बाद स्पष्ट हो जाता है कि संविधान निर्माताओं को भारत की चुनौतियां पता थीं और उनका समाधान भी. देश को एक रखने के लिए सबका साथ सबका विकास की जरूरत तब भी महसूस की गई थी. राष्ट्र की एकता सबसे जरूरी बात मानी गई थी. पर धीरे धीरे हम उस रास्ते की ओर बढ़ गए जहां तुष्टीकरण ही नीति बन गया.

संविधान की मूल कॉपी के हर पेज पर आपको भारत की सभ्यता और संस्कृति की झलक दिखाई देगी. जिस पन्ने पर मूल अधिकारों का जिक्र है उस पर प्रभु श्रीराम के अयोध्या लौटने की तस्वीर भी है. इसमें कृष्ण और अर्जुन के साथ नटराज की तस्वीर भी मौजूद है. मूल प्रति में गौतम बुद्ध, महावीर, गुरु गोबिंद सिंह की तस्वीरें हैं.

जिस तरह से जड़ के बिना किसी विशाल पेड़ की कल्पना नहीं की जा सकती है. उसी तरह संस्कृति से जुड़े बिना भारतीय संविधान भी मजबूत नहीं हो सकता है. ऐसी सोच संविधान निर्माताओं की थी. पर धीरे धीरे राजनीतिक स्वार्थ के लिए संविधान की भावना को पीछे धकेल दिया गया. इतना पीछे कि हरा रंग मुसलमान का और भगवा हिंदू का हो गया.

बिरयानी मुसलमान की और चावल हिंदू का हो गया. पक्षियों को भी हिंदू मुस्लिम के पिंजड़े में बंद कर दिया गया. धार्मिक आधार पर देश का बंटवारा होने के बाद संविधान निर्माताओं ने ये सोच लिया था कि हिंदू मुस्लिम की समस्या खत्म हो गई पर ऐसा पूरी तरह से हुआ नहीं. देश के लोग बंटे रहे देश में एकता की कमी महसूस होती रही. संविधान की बुनियादी सोच और भविष्य के भारत में विरोध दिखने लगे. नागरिक अपने संविधान से दूर होते गए और संविधान अपने मकसद से.

देश में संविधान को लेकर जानकारी कम है, इसकी एक वजह ये भी है कि हमारे देश के नेता इसके बारे में बात नहीं करते हैं, जागरूकता नहीं फैलाते हैं. इसका अपवाद वर्ष 2010 में मिलता है. संविधान को अपनाने के 60 वर्ष पूरा होने के मौके पर गुजरात के सुरेन्द्रनगर में संविधान गौरव यात्रा का आयोजन किया गया था. तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. संविधान की एक बड़ी कॉपी को हाथी पर रखकर पूरे शहर में यात्रा निकाली गई.
इस संविधान गौरव यात्रा की तुलना एक जैन विद्वान आचार्य हेमचंद्र-चार्य को दिए गए सम्मान से की जाती है. उन्होंने प्राकृत भाषा के व्याकरण के एक ग्रंथ की रचना की थी, जिसका नाम है,  सिद्ध हेमचंद्र शब्दानुशासन.

कहा जाता है आज से लगभग 900 वर्ष पहले गुजरात के ही पाटन शहर में राजा सिद्धराज ने इस ग्रंथ को हाथी पर रखकर धूमधाम से एक यात्रा निकाली थी.

लेकिन आमलोगों के बीच संविधान को प्रचलित करने के लोकप्रिय प्रयास कमजोर रहे. हालांकि कल 26 नवंबर को ही भारत की सेना ने संविधान के सम्मान में एक बड़ा प्रयास किया है. सियाचिन, कारगिल और देश की कई सीमाओं से कुछ तस्वीरें आई हैं जिसमें सैनिक तिरंगे के नीचे संविधान की प्रस्तावना पढ़ते दिख रहे हैं.

अब हम आपको अपने संविधान के बारे में कुछ रोचक बातें बताएंगे जिनके बारे में शायद आपको ज्यादा जानकारी नहीं होगी.

आज सबसे पहले आपको देश के संविधान की पहली पांडुलिपि दिखाते हैं. 26 नवंबर 1949 को संविधान स्वीकृत किए जाने के बाद  एक विशेष कागज पर हाथ से लिखकर इसे तैयार किया गया था. इस विशेष कागज की उम्र करीब 1 हजार वर्ष है. यानी एक हजार वर्षों तक ये सुरक्षित रहेगा. 251 पन्नों पर लिखकर तैयार की गई संविधान की इस कॉपी का वजन करीब 4 किलोग्राम है. संविधान की इस कॉपी पर ही 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के 292 प्रतिनिधियों ने दस्तखत किया था.

भारत की संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई थी. संविधान निर्माण के लिए संविधान सभा के कुल 11 अधिवेशन हुए थे. इन अधिवेशनों में कुल 53 हजार लोग शामिल हुए थे. संविधान सभा को इसे पास करने में दो वर्ष, 11 महीने और 17 दिन का समय लगा था. अभी हमारे संविधान में 448 अनुच्छेद, 12 अनुसूचियां, 24 भाग और 104 संशोधन हैं.

आपको ये जानकर हैरानी होगी कि संविधान का प्रारूप तैयार करने वाली समिति ने इसे हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में हाथ से लिखकर तैयार किया था. यानी इसमें कोई टाइपिंग या प्रिंटिंग शामिल नहीं थी.

संविधान का ड्राफ्ट बनाने से पहले संविधान सभा के सलाहकार बी एन राव के निर्देशन में 60 देशों के संविधान का अध्ययन किया गया था. अमेरिका का संविधान पूरी दुनिया का सबसे छोटा लिखित संविधान है. इसके मुकाबले भारत का संविधान करीब 5 गुना बड़ा है.

दुनिया के देशों में भारत का संविधान सबसे बड़ा है. इसमें 1 लाख 46 हजार से ज्यादा शब्द हैं.

दुनिया का दूसरा बड़ा संविधान नाइजीरिया का है जिसमें करीब 66 हजार शब्द हैं. यानी भारतीय संविधान इससे भी दोगुना बड़ा है.

संविधान देश के लिए जरूरी है क्योंकि इसमें प्रशासन या सरकार के अधिकार, उसके कर्तव्य और नागरिकों के अधिकार विस्तार से बताए गए हैं. संविधान दिवस के मौके पर हम सभी को ये संकल्प लेना चाहिए कि हम संविधान की सच्ची भावना को अपने जीवन में उतारें. इसे गीता जैसा सम्मान दें.

संविधान देश के लोगों में भगवद्गीता की तरह लोकप्रिय क्यों नहीं हुआ इसकी कुछ और वजह हम आपको बताते हैं.

संविधान के नीति निर्देशक तत्व में लिखा है कि राज्यों को समान आचार संहिता यानी Uniform Civil Code का विकास करना चाहि. पर आज तक ऐसा नहीं हुआ।

– वर्ष 2019 तक देश में तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं को कष्ट देता रहा. ये संविधान के खिलाफ था. पर तुष्टिकरण में संविधान की भावना से खिलवाड़ चलता रहा.

– वर्ष 1947 में धर्म के आधार पर पाकिस्तान का निर्माण हुआ और भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश बना.

– आज़ादी मिलने के बाद हम आर्थिक रूप से एक गरीब देश थे और आज 73 वर्षों के बाद भी देश में लगभग 9 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं.

– देश में सच्चे अर्थों में समानता नहीं आई है. देश के अलग-अलग राज्य धर्म और जाति के आधार पर आज भी अपनी जनता के साथ भेदभाव करते हैं.

– देश में सबको अभिव्यक्ति की आज़ादी है. लेकिन जब मीडिया अपने इस अधिकार का प्रयोग करता है तो कुछ राज्य सरकारें पत्रकारों को जेल भेज देती हैं.

-संविधान एक ईमानदार देश की कल्पना करता है पर देश में करप्शन आदत बन गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि न खाऊंगा न खाने दूंगा. ऊपरी स्तर पर करप्शन को रोका भी गया है. पर निचले स्तर पर भ्रष्टाचार की जड़े मजबूत हैं. 24 नवंबर को हमने आपको बताया था कि भारत एशिया का सबसे भ्रष्ट देश है.

डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि संविधान कितना भी अच्छा हो, मगर इसका इस्तेमाल करने वाले लोग बुरे होंगे, तो यह बुरा साबित होगा और अगर संविधान बुरा है, पर उसका इस्तेमाल करने वाले अच्छे लोग होंगे तो संविधान भी अच्छा सिद्ध होगा.



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