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नई दिल्लीः बीती एक फरवरी को सरकार ने बजट पेश किया है. जिसमें देश के विकास को गति देने के लिए कई प्रावधान किए गए हैं. ऐसे में बजट, कृषि कानून, किसान आंदोलन आदि कई मुद्दों पर ZEE मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ के संपादक दिलीप तिवारी ने वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर से बातचीत की. 

निर्मला सीतारमण जी ने बजट पेश किया, आप उनके डिप्टी हैं. मैं जानना चाहता हूं कि बजट को लेकर जो प्रतिक्रियाएं थी वो मिक्स थीं. विपक्ष बजट की आलोचना कर रहा है. आपको  क्या लगता है विपक्ष हमेशा गम में रहेगा और आपके समर्थक खुश रहेंगे

देश के कोने-कोने से बजट का स्वागत हुआ. जो लोग हमारी नीतियों की आलोचना करते थे उन्होंने भी बजट की प्रशंसा की है. देश को जिस तरह का बजट चाहिए था कि रोजगार उत्पन्न हों, कैपिटल एक्सपेंडिचर बढ़े और देश की विकास दर बढ़े. वो सभी कदम हमने किए. दूसरा आकलन शेयर मार्केट से भी पता चलता है. जहां पहले दिन सेंसेक्स में उछाल 2200 ज्यादा था और दूसरे दिन 1200 से ज्यादा था. लगातार मार्केट 50 हजार अंक से ऊपर बंद हुई. साथ ही अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए के लिए 51 फीसदी का इजाफा हुआ है. 83 हजार करोड़ से बढ़ाकर एक लाख 26 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया. किसानों के लिए पीएम किसान योजना के तहत 65 हजार करोड़ रुपए और मनरेगा के तहत 73 हजार करोड़ का बजट किया गया है. आधार भूत ढांचे के विकास के लिए 34.5 फीसदी बजट बढ़ाया गया है और  5.5 लाख करोड़ रुपए सरकार आधारभूत ढांचे को मजबूत करने पर खर्च करेगी. इससे पता चलता है कि सरकार शिक्षा स्वास्थ, सड़के, आदि के विकास पर ध्यान दे रही है. स्वास्थ्य पर तो 137 फीसदी बजट बढ़ाया गया है और सरकार इसके लिए 2.23 लाख करोड़ रुपए खर्च करेगी. ये आंकड़े दिखाते हैं कि हम कैसे देश को आगे ले जाने वाले हैं.

देश का मध्यम वर्ग इनकम टैक्स पेयर क्लास का कहना है कि हर बार बजट में उन्हें झुनझुना ही मिलता है. मध्यम वर्ग उम्मीद कर रहा था कि टैक्स में कुछ राहत मिलेगी और वह कोरोना की मार से उबर पाएंगे. आपको नहीं लगता कि ईमानदार टैक्स पेयर वर्ग को कुछ प्रोत्साहन मिलना चाहिए था?

अगर किसी सरकार में इनकम टैक्स में कमी आयी है तो वो मोदी सरकार है. हमने व्यक्तिगत टैक्स भी कम किए लोगों को विकल्प भी दिए कि वह पुरानी वाली व्यवस्था भी और नई वाली भी. कॉरपोरेट टैक्स भी 15 फीसदी किया है. जो व्यापार करता है उसे कम टैक्स देना पड़ता है. इससे किसको लाभ मिला! साथ ही बैंकों के ब्याज भी लगातार कम किए गए हैं. आज रियल एस्टेट सेक्टर में तेजी है और इसका कारण भी यही है कि लगातार ब्याज दर कम आ रही है तो लोग खरीददारी भी ज्यादा कर रहे हैं.

लोगों में चिंता है कि अक्सर पेट्रोल और डीजल सरकार के लिए राजस्व का स्त्रोत रहते हैं. आपने सेस लगाया है हालांकि आपने दूसरे टैक्स कम किए हैं तो कीमतें अभी ना बढ़ें. लेकिन लोगों को चिंता रहती है कि सरकार एक हाथ देती है दूसरे हाथ ले लेती है!

सरकार की कमाई का एक ही बड़ा जरिया है, वो है डायरेक्ट और इनडायरेक्ट टैक्स. वो भी लगातार कम हुए हैं. महामारी के दौर में लोगों के पास पैसा ज्यादा बचे. इसके लिए सरकार ने टीडीएस, टीसीएस में 25 फीसदी की कटौती की. साथ ही लोगों को इनकम टैक्स के 2 लाख करोड़ के रिफंड के तौर पर वापस किए जिससे लोगों के पास पैसा आए. बैंकों से किस्ते वापस ना करनी पड़े इसके लिए मोरटोरियम पीरियड दिया. जिससे उन्हें मूलधन और ब्याज चुकाने में राहत मिले. इस तरह सरकार ने लोगों को राहत देने के लिए सारे कदम उठाए और आगे भी तैयार हैं.  

किसानों का मसला हो या कृषि कानूनों की बात है सरकार का कहना है कि वह किसान हितैषी है. लेकिन बजट सत्र के दौरान विपक्ष सरकार के खिलाफ लामबंद है और किसान सड़कों पर बैठे हैं. ऐसे में सरकार जो मैसेज देना चाह रही है वो क्यों नहीं पहुंच रहा है?

पहले दिन से सरकार किसान हितैषी है. कृषि मंत्रालय के साथ किसान कल्याण शब्द जोड़ा. पीएम किसान सम्मान निधि योजना लेकर आए. इसके तहत हर किसान के खाते में 6 हजार रुपए डाले जा रहे हैं. अब तक एक लाख 10 हजार करोड़ रुपए किसानों के खाते में डाल चुके हैं. इस साल 65 हजार करोड़ का और प्रावधान किया है. फसल बीमा योजना लेकर आए. किसानों ने 14 हजार करोड़ रुपए का प्रीमियम दिया और मुआवजा 70 हजार करोड़ रुपए का दिया जा चुका है. एमएसपी खरीद भी बढ़ी है और दाम भी बढ़े हैं. गेहूं और धान के दाम 43 फीसदी बढ़े हैं. वहीं गेहूं 74 फीसदी और धान 113 फीसदी ज्यादा खरीदा गया है. दलहन तिलहन के दाम 65-70 फीसदी ज्यादा बढे. यूपीए के मुकाबले ढाई गुना ज्यादा एमएसपी खरीद हुई है. मोदी सरकार ने 8 लाख करोड़ रुपए दिए. स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार लागत प्लस 50 फीसदी मुनाफे का नियम लागू किया. किसान के लिए ज्यादा पैसे का इंतजाम किया. मंडियो को  सशक्त किया. पिछले साल 1000 मंडियों को ई-नाम के साथ जोड़ा है. इस साल और 1000 को जोड़ने जा रहे हैं. ये सब किसानों के हित में और उनकी आय बढ़ाने के लिए ही किया जा रहा है.

जहां तक किसान के धरने पर बैठने का सवाल है तो देश के ज्यादातर किसान कृषि कानूनों से खुश हैं. कुछ किसानों को गुमराह किया गया है. इसके पीछे कई ताकते हैं. एमएसपी पहले भी था और आगे भी रहेगा. मंडी पहले भी थी और आगे भी रहेगी, इसकी चिंता नहीं होनी चाहिए. किसानों को पराली की चिंता थी तो उस कानून को रोक लिया गया है. अब बिजली वाले कानून पर भी आपत्ति है. हालांकि पहले यह उनकी मांगों में नहीं था लेकिन अब मांग पत्र बढ़ता जा रहा है. हमने बातचीत से गुरेज नहीं किया और अब तक 11 दौर की चर्चा हो चुकी है. 26 जनवरी को जो देश में घटा वो दुर्भाग्यपूर्ण है, उसकी देश के हर व्यक्ति खुद किसान नेताओं ने भी निंदा की.

ये विदेशी ताकतें कौन सी हैं, जिन्हें सरकार समय रहते भांप नहीं पायी. जो कुछ लाल किले में हुआ, हिंसा हुई पुलिसकर्मी घायल हुए. क्या सरकार भांपने में चूक गई या सरकार भरोसे में रही?

 हमें किसानों पर तो भरोसा करना ही था. पहले ही दिन से हमें किसानों पर भरोसा था. वह हमारे अन्नदाता हैं और इसी लिए सरकार उनकी आय दोगुनी करने की दिशा में काम कर रही है. लेकिन उनके कंधे पर बंदूक रखकर कोई और चला जाए. अपनी राजनैतिक रोटियां सेक जाए. देश को बदनाम कर जाए. यह ठीक नहीं है. हमारे किसान देश हित के हैं. मैं स्वयं किसान, सैनिक परिवार से आता हूं. कुछ लोग किसानों को भ्रमित कर रहे हैं. ऐसा नहीं होना चाहिए.

इंटरनेशनल सिंगर रिहाना, पर्यावरणविद ग्रेटा थुनबर्ग ने किसानों के मुद्दे पर ट्वीट किए हैं. जिसके जवाब में भारतीय सेलिब्रिटीज ने भी ट्वीट किए हैं. जिसके बाद यह मुद्दा सुर्खियों में है. विदेश मंत्रालय ने भी बयान जारी कर कहा है कि हम किसा दबाव के आगे नहीं झुकेंगे. वहीं अमेरिकी सरकार ने भी कृषि कानूनों का समर्थन किया है. ऐसे में अब सरकार इस पर क्या सोच रही है?

देश की सुरक्षा और संप्रभुता के लिए सरकार पूरी ताकत से लगी है. देश के खिलाफ एजेंडा चलाने का जो प्रयास किया जा रहा है और कुछ लोग देश के अंदर भी बैठक ऐसा कर रहे हैं. ये दुर्भाग्यपूर्ण है. दुनिया देख रही है कि भारत की डबल डिजिट ग्रोथ होगी. ऐसे में जो लोग शरारती ट्वीट करके देश को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं. हम उन्हें कभी कामयाब नहीं होने देंगे. क्या रिहाना और ग्रेटा ने भारत के कृषि कानून पढ़े हैं. अगर नहीं पढ़े हैं और उन्हें जानकारी नहीं थी, तो किस आधार पर उन्होंने ट्वीट किया? जो लोग देश को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं उनके खिलाफ और जो देश में बैठकर ऐसा कर रहे हैं उनके खिलाफ जांच करके कड़ी कार्रवाई होनी ही चाहिए.

दिल्ली पुलिस पर आरोप है कि लोगों के मूलभूत अधिकारों को दबाने का प्रयास किया जा रहा है. जैसे दिल्ली के पास इंटरनेट ब्लॉक करना हो. ट्विटर पर भड़काऊ पोस्ट करने वालों को भी नोटिस दिया गया है. हालांकि फिर से कुछ अकाउंट रि-स्टोर कर दिए गए हैं.

देश के लोगों को तय करना पड़ेगा कि विदेशी कंपनियां जो सोशल प्लेटफॉर्म के जरिए हजारों करोड़ रुपए कमाती हैं, तो ऐसे प्लेटफॉर्म को देश को बदनाम करने के लिए प्रोपगैंडा करने के लिए इस्तेमाल करना चाहिए? अभिव्यक्ति की आजादी है लेकिन देश को तोड़ने की आजादी को किसी को नहीं दी गई. दिल्ली पुलिस क्या करे? दिल्ली पुलिस ने 26 जनवरी को ट्रैक्टर रैली की इजाजत दी. लेकिन इस बात की इजाजत तो नहीं दी गई थी कि आप लाल किले पर दूसरा झंडा फहरा दें. ट्रैक्टर से लोगों को कुचलने का प्रयास करें. विपक्षी नेता बोल रहे हैं कि पुलिस ने लोगों को मारा क्यों नहीं? अब लोगों को रोकने का इंतजाम क्यों कर रही है? ऐसे में ये नेता ही बता दें कि दिल्ली पुलिस को क्या करना चाहिए?

क्या दिल्ली पुलिस पर दिल्ली के ढाई करोड़ लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी नहीं है? भारत के खिलाफ षडयंत्र करना क्या दिल्ली पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है? दिल्ली पुलिस को वो ही करना चाहिए जो कानूनी रूप से सही है. साथ ही देश की सुरक्षा के लिए भी जो कदम उठाने हैं वो भारत की हर एजेंसी को करने ही चाहिए.

प्रधानमंत्री कहते हैं कि एक फोन की दूरी पर सरकार बैठी है. वहीं किसान लगातार पंचायतें कर तीनों कृषि कानूनों को वापस करने की मांग कर रहे हैं. ऐसे में रास्ता कैसे निकलेगा?

हर आंदोलन का रास्ता बातचीत से निकलता है. लेकिन ऐसे नहीं कि तीनों कानूनों को वापस कर लें. अगर देश के अधिकतर किसान तीनों कानूनों से खुश हैं. किसानों की आय इनसे दोगुनी हो सकती है, उन्हें ज्यादा अवसर मिल सकते हैं तो कोई तर्क तो बताए कि किस कानून में क्या कमी है? ये कौन सा तर्क है कि तीनों कानून वापस ले लो लेकिन यह कोई बताने को तैयार नहीं है कि कानून के किस क्लॉज में कमी है! सरकार ने 11 राउंड बातचीत की है और आगे भी बातचीत के लिए तैयार है.

इस मुद्दे पर संसद में भी चर्चा नहीं हो पा रही है

हम चर्चा के लिए तैयार हैं. सरकार ने पहले दिन से कहा है कि जो भी चर्चा करनी है हम सदन के लिए करने के लिए तैयार हैं . स्टूडियो पर करनी हैं वहां हमारे प्रवक्ता तैयार हैं, सड़क पर करनी है तो वहां भी हमारे नेता तैयार हैं. सदन में चर्चा के लिए तैयार हैं.

सरकार अपनी मंशा साफ कर चुकी है लेकिन जिन लोगों तक यह बात पहुंचनी चाहिए वहां तक क्यों नहीं पहुंच पा  रही है. इसके लिए आप किन्हें जिम्मेदार मानते हैं?

सरकार का काम है सभी की बात सुनना और चर्चा कर समन्वय का रास्ता निकालना. हमने कई बार चर्चा की है. जहां बदलाव की जरूरत होगी वहां बदलाव भी किया जाएगा.

राहुल गांधी तो इस पर सवाल उठा रहे हैं और तानाशाही का आरोप लगाते हुए ट्वीट कर रहे हैं!

राहुल गांधी को शायद इंदिरा गांधी जी की याद आ रही होगी. आपातकाल का समय याद आ रहा होगा. जहां मीडिया के लोगों पर भी प्रतिबंध था. अब तो सब अपनी बात कह रहे हैं. राहुल गांधी एंटरटेनमेंट अच्छा करते हैं.

प्रियंका गांधी किसानों के परिवार से मिल रही हैं. ट्रैक्टर रैली के दौरान जिस युवक की मौत ट्रैक्टर पलटने से हुई थी उसके परिवार से भी मिलने गई हैं.

देखिए, उन्हें अपनी राजनीति करनी है, जैसा चाहें वैसा करें. भाई बहन को ही तो कांग्रेस चलानी है. उस परिवार को तय करना है कि कांग्रेस ने क्या करना है. बाकी नेता तो सिर्फ जी हजूरी के लिए हैं. उसमें मुझे कुछ टिप्पणी नहीं करनी है.

आम आदमी पार्टी का आरोप है कि बीजेपी के जो नेता हैं, जो मंत्री हैं, जो बातचीत करते हैं, वो पहले से ही एक फ्रेम ऑफ माइंड में आते हैं. अपनी बात कहते हैं. ऐसे में किसान इस मुद्दे को कैसे सुलझाएं? आम आदमी पार्टी का आरोप है कि सुनते तो हैं नहीं बस मीटिंग हो रही हैं.

अगर इतने घंटे बैठक होती है, चर्चा होती है. सभी को सुना जाता है. ये शायद अपनी पार्टी की बात कर रहे हैं, जहां जो पार्टी के संस्थापक सदस्य थे, वो छोड़कर चले गए हैं. आम आदमी पार्टी के कारण अराजकता हो सकती है. हम लोकतंत्र में और देश के संघीय ढांचे में विश्वास रखते हैं. राज्य सरकारों और देश की जनता को साथ लेकर चलने वाले हैं. कोरोना में प्रधानमंत्री ने संवाद किया है. महामारी के दौरान प्रधानमंत्री ने जैसा काम किया है, उसकी प्रशंसा पूरी दुनिया में हो रही है. जिन देशों में मृत्यु दर कम रही, उनमें भारत है.

चुनाव का समय है, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में चुनाव होने हैं. बंगाल में ममता बनर्जी का आरोप है कि बीजेपी के नेता हिंसा कराते हैं. चुनाव से पहले हिंसा कराकर लोगों में डर पैदा कर रहे हैं.

राज्य में उनकी सरकार है. दीदी तो कहने के लिए रह गई हैं दादागिरी चलती है. ममता कहीं दिखाई नहीं देती. उनकी नाव में इतने छेद हो रहे हैं कि एक एक कर नेता उन्हें छोड़ रहे हैं. टीएमसी की नाव जल्द ही डूबने वाली है. कटमनी से लेकर भ्रष्टाचार, चिटफंड घोटाले ममता सरकार में हुए हैं. एक मुख्यमंत्री की पेंटिंग तीन करोड़ में बिकती है और उसे खरीदती है चिटफंड वाली कंपनी. ममता बनर्जी को उसका जवाब देना चाहिए. यह दीदी भतीजे की सरकार है.

आपका राज्य हिमाचल प्रदेश 1971 में बना और अब 50 साल का हो गया है, मैच्योर हो गया है. क्या अब विकास में भी वो मैच्योरिटी आ गई है या अभी बहुत कुछ होना है?

हालांकि अभी 50 साल वाली मैच्योरिटी नेताओं को भी नहीं आयी है..इस पर दिलीप तिवारी ने पूछा कि क्या आप राहुल गांधी की बात कर रहे हैं? इस पर उन्होंने कहा कि मैं किसी का नाम नहीं लूंगा लेकिन आप समझदार हैं…लेकिन हिमाचल प्रदेश की सरकारों ने अच्छा काम किया है. इसी के कारण शिक्षा, स्वास्थ्य आदि पैमानों पर हिमाचल को मॉडल स्टेट के रूप में देखा जाता है. लेकिन अभी भी हिमाचल को बहुत करना चाहिए और एक नॉलेज बेस्ड इकोनॉमी बनाना चाहिए. इसके लिए कुछ क्षेत्र चुनकर उनपर काम करना चाहिए. फिर चाहे वो टूरिज्म है, हाइड्रोपावर टेक्नोलॉजी है, एजुकेशन, आईटी, हैंडीक्राफ्ट और हैंडलूम पर फोकस करना चाहिए ताकि राज्य तेज गति से आगे बढ़ सके. ताकि रोजगार भी उत्पन्न हों और प्रदेश की आय भी बढ़ सके.

आपसे राज्य के लोग उम्मीद करते हैं कि आप देश के वित्त राज्यमंत्री हैं. तो स्पेशल पैकेज, रेलवे आदि की बात होती है. इलेक्शन भी होंगे तो आपका इस पर क्या कहना है…

भनुपुली-बिलासपुर रेलवे लाइन को तेजी से आगे बढ़ा रहे हैं. नंगल-उना-तलवाड़ा रेल लाइन पर भी तेजी से काम हो रहा है. इसके साथ हमारा प्रयास आधारभूत ढांचे जैसे सड़के, आईआईटी, आईआईएम, अस्पताल आदि बनवाए. ड्रग फार्मा की 35-40 हजार करोड़ रुपए की निवेश आ सकती है. उसको लेने का प्रयास है. टैक्सटाइल पार्क भविष्य में हिमाचल में बने ताकि रोजगार का सृजन हो और आम आदमी को इसका लाभ मिल सके.

आपकी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हिमाचल से हैं. आपकी गिनती भी राष्ट्रीय स्तर पर भविष्य के नेताओं में होती है. क्या आपके समर्थक भी चाहते हैं कि आप भी दावेदार हों. आम आदमी पार्टी भी हिमाचल में चुनाव लड़ने की बात कह रही है.

लोकतंत्र में हर किसी को अधिकार जो जहां से चाहे वहां से चुनाव लड़ सकता है. जिसकी विचारधारा को जनता पसंद करेगी उसे मौका मिलेगा. मुझे हमीरपुर की जनता ने चार बार लोकसभा पहुंचाया है. मैंने भी कोशिश की है कि अपनी लोकसभा का चहुमुंखी विकास करूं. देश के प्रधानमंत्री जब हिमाचल आकर हिमाचल का छोकरा संबोधित करते हैं तो उसी से पता चलता है कि जनता ने मुझे कहां से कहां तक पहुंचाया है. जितनी मेरी पहचान बनी उसके लिए जनता का आभारी हूं.

आने वाले चुनाव में आपकी पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?

अभी चुनाव में दो साल का वक्त बाकी है और जयराम जी की सरकार प्रदेश की जनता के लिए काम कर रही है और उम्मीद है कि अगले दो साल भी करेगी.    

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